Monday, 15 October 2012

लो चाँद के आगोश से निकल रही हे चांदनी
बे सब्र -सी जमीं पे क्यूँ टहल रही हे चांदनी
कब तक छुपेगा हा ले -दिल ये हो ही जायगा अयाँ
क्यूँ बात ,बात -बात में बदल रही हे चांदनी

Thursday, 19 July 2012

मित्रों ,कुछ दिनों पहले पंजाबी भषा के विद्वान् श्री मान हरबंस जी का फ़ोन आया ,कहा कि अभी अभी आपकी कृति 'आओ नैनीताल चलें 'पद कर पूरी कि हे .दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले से खरीदी हे .ऐसा लग रहा हे कि मैं नैनीताल में ही हूँ .वहीँ घूम रहा हूँ . अब मैं नैनीताल जरुर जाऊंगा .आपने बहुत ही अच्छा ,स्वाभाविक वृतांत जिखा हे .आनंद आ गया .आपको बहुत .............बड़ाई .हम सब लेखकों के लिए ये प्रेरणात्मक उदगार हमारा होंसला बढ़ाते हें .ये हमारी पूंजी हे .ये ख़ुशी हम सबकी हे .आप भी इस में शामिल हें .......आभार ..............
इश्क का आगाज हे ,कुछ मत कहो
वो अभी नाराज हे कुछ मत कहो
बांध कर पर जिसने छोड़े हें परिन्द
वो कबूतर बज हे ,कुछ मत कहो
चीखती हे बे जुबाँ खामोशियाँ
... ये वही आवाज हे कुछ मत कहो

अब हे चिड़ियों का मुहाफिज राम ही
पहरे पे इक बज हे ,कुछ मत कहो

,कमसिन 'अपनी हे गजल जेसी भी हे
हम को इस पर नाज हे ,कुछ मत कहो
....यो हम क्या करें ...गजल संग्रह

Sunday, 20 May 2012

आरती हे अजान हे ,गुरुबानी हे माँ
करुणा वात्सल्य की कहानी हे माँ
गीत -संगीत ,शब्द और ब्रह्म भी
नदी सी बहती रवानी हे माँ
कृष्णा

Sunday, 18 March 2012

More pictures..

Devraj Upadhyaay Puraskaar

मित्रों ,आप सब कि दुआओं से कल ,११,मार्च को राजस्थान सहित्य अकादमी द्वारा मरी पुस्तक 'ज्योतिर्गमय ;को 'देवराज उपाध्याय पुरस्कार -२००८ -०९ ' प्रदान किया गया हे .कार्यक्रम उदयपुर में हुआ .इस पुस्तक में सांस्कृतिक निबन्ध हे .please ,ऐसे ही अपना स्नेह बनाये रखियगा . समारोह कि कुछ तस्वीरें .....
 

Kam se kam saamaan rakhna !!

कम से कम सामान रखना

कम से कम सामान रखना
ज़िन्दगी आसान रखना
फ़िक्र औरों की है लाज़िम
पहले अपना ध्यान रखना
हर कोई कतरा के चल दे
ऐसा क्या अभिमान रखना
भीड़ में घुलमिल के भी तू
अपनी कुछ पहचान रखना
ज्ञान बिन है व्यर्थ जीवन
कम से कम ये ज्ञान रखना
कर निबह काँटों से लेकिन
फूल का भी ध्यान रखना
तेरे दिल में जिसका दिल है
उस में अपनी जान रखना
हिज्र मज्ब़ूरी है कमसिन

Thursday, 8 March 2012

अब कि बार /अरे ओ फागुन
मन का आँगन रंग -रंग कर जाना
युगों -युगों से भीगी नहीं बासंती चोली
रही सदा ही सुनी -सुनी मेरी होली
पुलकन सिहरन अंग अंग भर जाना .../..
अजब हवा हे मन के मोसम बहक रहे हे
दावानल सम अधर पलाशी दाहक रहे हे
बरसा कर रति रंग दंग कर जाना ....
बरसों बाद प्रवासी प्रियतम घर आयेगें
मेरे विरह नयन लजाते सकुचायेगें a
तू पलकों में मिलन भंग भर जाना ....
कृष्णा कुमारी
(अपने कविता सग्रह से )

Saturday, 4 February 2012

गजल
छोड़ो ये किरदार की बातें
और हे संसार की बातें
साथ न देता कोई किसी का

ये सब हे बेकार की बातें
भाई से भाई करता हे
अब तो बस दीवार की बातें
शादी लायक हो गया बेटा
अब होगीं व्यापर की बातें

दूध के भी तो दांतन टूटे
करते हे हथियार की बातें
कडवी लगती हे बच्चों को

अब तो शिष्टाचार की बातें
गुलशन में होती हे keval
काटों के श्रृंगार की बातें
हाय ज़माने मिलती हे बस
कविताओं में प्यार की बातें

कमसिन कब मंजूर जहाँ को
क्यूँ करती हो प्यार की बातें

Friday, 6 January 2012

मम्मी अब तो दया करो
\रूप लंच का नया करो
देख -देख कर चड़ेबुखार
रोज पराठें और आचार a
टीचर जी भी कहती हे
पड़ जाओगे तुम बीमार
कोई इंग्लिश डिश रख दो
कुछ काजू किशमिश रख do
इडली डोसा भेल पुरीथोड़ी सी
गुड विश रख दो
मम्मी अब तो दया करो
रूप लंच का नया करो