Monday, 15 October 2012

लो चाँद के आगोश से निकल रही हे चांदनी
बे सब्र -सी जमीं पे क्यूँ टहल रही हे चांदनी
कब तक छुपेगा हा ले -दिल ये हो ही जायगा अयाँ
क्यूँ बात ,बात -बात में बदल रही हे चांदनी

2 comments:

  1. "लो चाँद के आगोश से निकल रही हे चांदनी
    बे सब्र -सी जमीं पे क्यूँ टहल रही हे चांदनी"

    वाह वाह

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