Thursday, 19 November 2015


तुम्हें न आई याद हमारी            

                        

तिल-तिल उम्र गवाई सारी

तुम्हें न आई याद हमारी

सावन गरजा, भादो बरसा

होली में तन –मन भी तरसा

दीपाली पर स्नेह लुटाया

फिर भी मन मेरा ही तरसा

बाती बनाकर रात बिताई .......तुम्हें न .....

बस्ती  के हर चोराहे पर

तुम को कितनी बार पुकारा

हाथ थाम कर पथ पर चलना

क्या तुम को है नहीं गवारा

मैं तो इस जीवन से हारी ...तुम्हें न .....

मेरी अश्रु झड़ी के आगे

सावन भी तो हार गया

करुण-कणों का दान मांगने

वह सागर के द्वार गया

मन की धार लुटाई सारी...तुम्हें न ....

लिए हाथ में विष का प्याला

पिया श्याम की मीरा बनकर

खड़ी हुई जन्मों से प्यासी

स्मृति की गागर ले पनघट पर

चिर वियोगिनी बनी तुम्हारी

तुम्हें न आई याद हमारी

 

 

 

 

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