Wednesday, 3 April 2013


मित्रों ,मेरी मित्र नंदिता को मैंने अपनी बुक 'आओ नैनीताल चलें 'भेंट की थी , कुछ दिनों पहले .कल ही वह घर पर तशरीफ ली थी .कुछ देर बाद कहने लगी ..'मैंने आप की पुस्तक पूरी पद ली हे .मेरे जीवन की ये पहली किताब हे जिसे मैंने पूरा पढा हे . कोर्स की किताबें भी मैं नहीं पद पाती हूँ .इतनी रोचक हे ये किताब कि ...बता नहीं सकती ......ऐसा लगा कि जेसे आप के के साथ -साथ मैं नैनीताल घूम रही हूँ .....इस मैं आप स...ीधे पाठकों से बातें कर रही हो ....भाषा भी इतनी सरल कि समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई .......जवाब में मैंने कहा कि चलो मेहनत सफल हुई ...इस पर नंदिता तुरंत बोली बहुत ...बहुत .....सफल हुई हे .....उसे मैंने दिल से शुक्रिया कहा .....ये सब भगवान जी की कृपा से ही हे .
कोटा आकाशवाणी से इंटरव्यू में पूछा था कि आज के युवा साहित्य से दूर हो रहे हें ....उन्हें इस से केसे जोड़ा जाये ....इस बात से मैं ये ही कहना चाह रही हूँ कि युवा पढना चाहते हें ...मगर उन तक किताबें नहें पहुँच रही .....हमारे स्वागत कक्ष में अब न ही किताबें होते हें ....न ही पत्रिकाएं ......हम हर कीमती चीज खरीदतें हें पर किताबेंनहीं ....तो दोष उन का नहीं ...हमारा हें ...ऊपर वाली बात कह ने का मेरा ये ही प्रयोजन हे ....हे बात मैं कई युआओं .से बात कर के ही कह रही हूँ .......आप सब का शुक्रिया ....

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