Thursday, 28 July 2016

  
निबंध
                      बदलाव                                                               कृष्णा कुमारी
परिवर्तन सृष्टि का अटल नियम है। हर पल, हर चीज़ में बदलती रहती है। यहाँ तक कि मानव शरीर में प्रतिक्षण परिवर्तन होता जाता है, उसे मगर वह महसूस नहीं कर पाता। संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सतत् आमूल परिवर्तन होता रहता है, यही शाश्वत सत्य है। परिवर्तन की इसी प्रक्रिया के वशीभूत मानव स्वभाव भी बदलाव चाहता है। क्योंकि इससे भारत की विरासत खण्डित होने का भय भी बना हुआ है। वो भी इतना कि सुबह की सब्जी तक भी वह शाम को नहीं खाना चाहता। उसे एकरसता कतई नहीं सुहाती। घर में भी चीजों को इधर-उधर बदलना इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है।
वाकई परिवर्तन सौंदर्य की केन्द्र बिन्दू है। सौंदर्य ही शिव और सत्य है। लेकिन इन दिनों भारतीय संस्कृति, रीति-रिवाजों, परम्पराओं, धारणाओं, जीवन मूल्यों के निरन्तर होते क्षरण पर हो हल्ला बोला जा रहा है। बुद्धिजीवी इसी बात को लेकर चिंतित है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत समाप्त होती जा रही है। साथ ही विदेशी आयातीत अपसंस्कृति का आक्रमण भी चिन्ता का विषय बना हुआ है क्योंकि इससे भारत की विरासत खण्डित होने का भय भी बना हुआ है। जो चीज समाप्त होने लगती है या हम से दूर होती जाती है उससे और अधिक लगाव एवं उसे सहेज कर रखने की कमना बरबस बलवती होने लगती है।
लेकिन यहाँ हम यह भूल रहे हैं कि परिवर्तन विकास का मूलमंत्र है। यदि परिवर्तन नही होते तो अभी तक हम प्रस्तर युग में जी रहे होते। आज जितनी भी आशातीत, कल्पनातीत प्रगति मानव ने की है यहाँ तक कि चाँद पर कदम रखने की ही बात करें तो यह अनवरत होते परिवर्तन से ही सम्भव हुआ है। पैदल चलने से लेकर राकेट तक की यात्रा बदलते संदर्भों का ही सुपरिणाम है। ऐसा नहीं होता तो एकरसता का अंधकार व्यक्ति को घेर लेता जो जड़ता का प्रतीक है। यदि चूल्हे से ही चिपके रहतें तो आज गैस का चूल्हा, माइक्रो ओवन नहीं होता, ग्रामाफोन से सी.डी. तक नहीं पहुँचते। हाँ, कुछ खत्म होता है तो कुछ नया ईजाद भी होता है। रात आती है तो सुबह भी खिलती है। यदि बहते हुये जल को रोक दिया जाऐ तो वह सड़ने लगता है ।
इसी परिप्रेक्षय में 7.4.10 की राज. पत्रिका में "समाज" कॉलम में सुधीर पचेरी ने लिखा है "बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ उपयोगी अपना लिया गया है। बहुत कुछ जोड़ दिया गया है। समाजों के उपयोगिता के हिसाब से शुद्धता का भी मिश्रण किया जाता है जबर्दस्ती न कुछ स्वीकार किया जाता है न ही अस्वीकार किया जाता है। यदि हम जरा सी देर कल्पना ही करें कि कुछ समय के लिए ही सही यह संसार एकदम ठहर जाए, तो कैसा लगेगा, बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। "चलती का नाम गाड़ी है" यह उक्ति इस विषय में पूरी तरह प्रासंगिक ठहरती है। जय शंकर प्रसाद की यह पंक्तियाँ इसी बात की पुष्टि कर रही हैः-
"पुरातनता का यह निर्मोक
सहन न करती प्रकृति एक"
 
संसार में जब तक परिवर्तन का क्रम जारी रहेगा, तभी तक वह संसार कायम रह पायेगा। सतत् विकास प्रकृति का सिद्धान्त है, इसे कैसे भी नकारा नहीं जा सकता। आज हम घर बैठे पूरी दुनिया की गतिविधियों को देख लेते हैं, हज़ारों मील दूर बैठे अपनों से बातें कर लेते हैं, उन्हें देख भी लेते हैं। आज मनुष्य की आयु वृद्धि की दर बढ़ी है, यह सब तरक्की का ही परिणाम है। कुछ पाने के लिये, कुछ खोना भी पड़ता है। इस स्वाभाविक सच को हमें स्वीकारना होगा। उदार दृष्टिकोण से चीजों को देखना परखना होगा। तभी हम निष्पक्षता से चीजों के प्रति न्याय कर पायेंगे, दुराग्रहों से मुक्त हो पायेंगे।
पुरानी चीजों के समाप्त होने की चिंता, संस्कृतिक विरासत के खोने का डर भी कम होगा। जो कुछ हम बचा कर रख सकते हैं, उन्हें सहेज कर रख लिया जाए जैसे गीत-संगीत, जिन्हें सी.डी. में सहेजा जा सकता है। पुरानी चीजों को सहेजकर संग्रहीत किया जा सकता है। चक्की, चूल्हे तो अभी ग्रामीण अंचलों में खूब प्रचलित हैं। जिस दिन खत्म होंगी, बचा लिया जाए। बहुत सी चीजों को पुस्तकों में बचाया जा सकता है, संग्रहालयों में रख कर महफ़ूज रखा जा सकता है।
वैसे तो चीजों को बचाये रखने के कई आधुनिक तरीके ईजाद हो चुके हैं। फिर भी जिसे कैसे भी नहीं बचाया जा सकता है, वहाँ स्थिति को स्वीकारने के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। केवल सेमीनारों, गोष्ठियों में बयान बाजी, भाषण बाजी करने से या अखबारों में लिखने से या मात्र हो-हल्ला मचाने से कुछ हासिल नहीं होगा। वाकई हमें संस्कृति से प्रेम है तो उसे बचाने के लिये व्यावहारिक कदम उठाने होंगे, मेहनत करनी होगी, ईमानदारी से लड़ना होगा, विदेशी आक्रमण का मुँह तोड़ जवाब देना होगा। दुष्यन्त कुमार का एक शैर यहाँ याद आ रहा हैः-
"सिर्फ हंगामा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी, चाहिए"
जबकि आजकल केवल हंगामा मचाकर यश कमाने की प्रतिस्पर्द्धा चल रही है। जिस अपसंस्कृति को लेकर चिंता जताई जाती है, उसे वही व्यक्ति दैनिक जीवन में अपनाते हुये देखे जा सकते हैं। विदेशी चीजों को अपनाकर गर्वित होते हैं, इतराते हैं। जन्म दिन पर मंदिर जाने के बजाए दान देने के बजाए केक ही काटा जाता है। यानी, आयातीत संस्कृति को बढ़ावा भी तो हम ही दे रहे हैं। फिर चिंता या शिकायत कैसी, कुछ अपवाद ज़रूर मिलेंगे। चूल्हे की रोटी की दुहाई देने वालों के घर में शान से गैस के चूल्हे पर खाना बनता है। फिर भी कुछ लोग है जिन्हें वाकई पुरानी चीजों से, मूल्यों से प्रेम है। वो व्यवहार में उन्हें अपनाते भी हैं।
देखिए, परिवर्तन को तो कोई भी माई का लाल नहीं रोक सकता। केवल जो वश में है, वह बचा लिया जाये और उदारता से भी काम लिया जाये। हमेशा चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती, या "ओल्ड इज गोल्ड" हो ही जरूरी भी नहीं, नया भी तो गोल्ड नहीं हो सकता। दोनों बातें अपनी जगह है। हर युग में अच्छाई बुराई समानान्तर चलती है, चलती रहेगी। वैज्ञानिक आविष्कारों ने हमें एक से एक सुविधा दी है। आज हम चंद दिनों में दुनिया की सैर करते हैं। देखना यह है कि इन सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जा रहा है। दुरूपयोग होने से वही सुविधा संकट खड़ा कर देती है। इंटरनेट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। बजाए, परिवर्तन को कोसने के, उसका दुरुपयोग रोका जाये। सदुपयोग को बढ़ावा दिया जाये।
यहां पर एक और बात ज़हन में आती है कि कही हम परिवर्तन से डरते तो नहीं । बनी बनाई लीक पर चलना, परम्पराओं से चिपके रहना हमारी मज़बूरी है या इन पर चलना आसान भी है। क्यों कि कुछ भी नया करने या स्वीकारने के लिये हौंसला, चाहिये। और यह साहस केवल तीन प्राणी ही करते है।
"लीक छोड़ तीनों चले
सायर, सिंह, सपूत"
इसी प्रसंग में कात्यायनी उप्रेती के विचार भी बहुत कुछ सार्थक है। 24.6.09 के नवभारत टाइम्स (मुम्बई) में लिखती है कि "इसी तरह हमारी जिन्दगी के रास्ते भी तय होते है। जीवन मे कई चीजें बदलाव चाहती है, लेकिन यह सोचकर कि यही चला आ रहा है, हम एक ही ठर्रे की जिन्दगी जीनें पर मज़बूर करती है। बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत सोचने की और उस सोच पर अमल करन की। तमाम वैज्ञानिकों , कलाकारों, लेखकों की हिम्मत का ही नतीजा है कि हम रोज एक बेहतर दुनिया में जी रहे होते है। लेकिन दुनिया में एक बड़ा हिस्सा वह है, जो यह हिम्मत नहीं कर पाता है"
हिम्मत भी नहीं कर पाता और चीजों से मोह भंग भी नहीं कर पाता। मोह ऐसा भाव है जो हमें अपनी पुरानी चीजों से बरबस चिपके रहने को विवश करता है। और हम उनका गुणगान करते नहीं थकते लेकिन उनसे चिपके रहना उत्थान में बाधक होता है, यह याद रखना भी ज़रूरी है। समयानुसार चीजें बदलती है, बदलती रहेंगी, चाहे हम कुछ भी कर ले। अतः बहतर यही है कि चीजों को देखने का अपना नजरिया बदला जाए, उदारता से, निष्पक्षता से चिंतन किया जाऐ। उनकी उपयोगिता का आकलन खुले मन से किया जाए। सकारात्मक परिवर्तन को स्वीकारना, नकारात्मक बदलाव के प्रति सतर्क रहते हुये समाज को, विशेषकर युवा पीढ़ी को इस से बचाने के वाकई प्रयास किये जायें।
कृष्णा कुमारी


यात्रा -वृतांत
अद्भुत देश है सिंगापुर

           बिल्कुल परीलोक की तरह खूबसूरत है सिंगापुर। जब इस देश की धरती पर कदम रखा एवं एक झलक देखी तो लगा कि अपनी परिकल्पनाओं, सपनों का साकार देश, यही है। जिधर भी दृष्टि जाती आकाश का स्पर्श करने को आतुर बहुमंजिली इमारतें और हरितिमा का साम्राज्य। काँचसी फिसलती सड़कों के दोनों ओर फुलवारी, पंक्तिबद्ध घनी वृक्षावलियाँ, धरती पर बिछी हरी मख़्मल की चादर भला किस का मन नहीं मोह लेगी। इसीलिए इसे ग्रीनसिटी कहते है। वैसे इसे हम सिटी ऑफ बिल्डिंग्सभी कह सकते हैं। दुनिया का सबसे ऊँचा 73 मंजिला होटल यहीं है। पहला नाइट सफारी यहीं है तो दक्षिणी पूर्व एशिया का सबसे बड़ा जुरोंग बर्ड पार्कभी यही है।
हम आगे का सफर तय करें उस के पहले यह बता दें कि हमें यहाँ जाने कैसे अवसर मिला। हाँ एयर इण्डिया एवं राजस्थान पत्रिका की ओर से आयोजित रेंक एण्ड बोल्ट प्रतियोगिता में राज्य स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले शिक्षक एवं छात्र को पुरस्कार स्वरुप सिंगापुर का भ्रमण करवाया गया जिस में भारत के 18 राज्यों के शिक्षक एवं छात्र सम्मिलित थे। इन में एक खुशनसीब हम भी है।
सर्वप्रथम तो हवार्इयात्रा का रोमांचक अनुभव, बादलों की सैर अपने आप में अप्रतिम अहसास है जो शब्दों से परे है। पक्षियों को नीलगगन में उड़ते समय कैसा लगता होगा, उस की कुछ अनुभूति हम कर रहें थे। अस्ली नहीं तो नक्ली पंखों से ही सही। नीचे बादल, समुद्र, जंगल, बस्तियाँ, वाह ! ....... क्या कहने ......! जहाज तो बच्चों के खिलौनों जैसे लग रहे थे। बीचबीच में छोटेछोटे आइलैंड भी पानी में तैरने का अहसास दिला रहे थे। लगभग 9,00 कि.मी. प्रति घण्टा की गति से उड़ते जहाज का आभास तक नहीं हो रहा था।
जैसे ही सिंगापुर उतरे तो एक बार विश्वास ही नहीं हुआ कि हम विदेश में हैं। क्योंकि फिल्हाल ऐसा सोचा ही नहीं था। बस परम आनन्द की स्थिति में थे। वहाँ वक्त लगभग ढार्इ घण्टे आगे चल रहा था, सो वक्त के साथ मिलना पड़ा, यानी घड़ीयाँ सेट कीं। चाँगी एयरपोर्ट, जो दुनिया का उत्कृष्ट पोर्ट है, वाकर्इ बेहद ख़ूबसूरत है। उतरते ही सिंगापुर एयर इण्डिया के मेजबानों ने पूरे दल का टूट कर स्वागत किया। फोटोग्राफ्स का सिलसिला तो मुम्बर्इ एयरपोर्ट से ही प्रारम्भ हो गया था, वापस चाँगी तक चलता रहा।
वहाँ से सागर के किनारेकिनारे चलतेचलते, सिंगापुर नदी को पार कर के होटल गोल्डन लैण्ड मार्कपहुँचे। जहाँ सब को ज्यूस से स्वागत कर के रुमकार्ड दिए, क्योंकि कार्ड से ही कमरे का ताला खोला जा सकता है। उस शाम प्रेसकान्फ्रेन्स हुर्इ, रात का भोजन, फिर मुश्तफा मोल का सरसरी अवलोकन। इस के पूर्व होटल के आसपास पैदलभ्रमण का लुत्फ उठाया।
आप विश्वास करेंगे, ........ चार दिनों में वहाँ हजारों कारों के चलते हार्न तक नहीं सुना। धूल का कण धूआँ, प्रदूषण का अस्तित्व ही नज़र नहीं आया। इतनी स्वच्छता कभी देखी नहीं थी। सारी गाड़ियाँ इतनी चमचमातीं कि आज ही खरीदी गर्इ हों। सारा ट्रेफिक अपनीअपनी सीमा में दौड़ता रहता है, स्वानुशासन का अन्दाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि कहीं पुलिस की वर्दी दिखार्इ नहीं दी। बस पुलिस स्टेशन ज़रुर नज़र आया जो पंचतारा होटल जैसा था।
वहाँ हम न्यू वाटर प्लाण्ट देखनें गए जहाँ गन्दे पानी को स्वच्छ किया जाता है जो W.H.O. द्वारा जाँच के बाद दुनिया का नम्बर वन शुद्ध पानी पाया गया है। एक से एक नर्इ तकनीकें यहाँ देखने को मिलीं। संसाधनों की कमी के बावजूद यहाँ के नागरिकों में कर्तव्यनिष्ठा, लगन, कठिन परिश्रम का ही परिणाम है कि अत्याधुनिक तकनीक में अग्रणी है सिंगापुर। साइन्स सेन्टर जहाँ सैंकड़ों तरह की टेक्नॉलाजी देखने को मिलीं। म्यूजियम देखने के बाद वहीं बहती सिंगापुर नदी में क्रूज का हम लोगों ने आनन्द लिया एवं सभी ने जम कर स्नेप्स लिए। नदी किनारे ही यहाँ का राष्ट्रीय प्रतीक श्वेत सिंग की भव्य प्रतिमा है, जिस के मुँह से फ़व्वारा निकल रहा था, जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। नदी के दूसरे छोर पर भव्य इमारतों की कतार देखते ही बनता था। कुल मिला कर यहाँ की एकएक इमारत ही नहीं ज़र्राज़र्रा दर्शनीय है।
रात को नाइट सफारी के तो कहने ही क्या। बिना बत्ती की ट्राम में सफर का आनन्द .........! वाह ...... ! अनेक प्रजातियों के सैंकड़ों जंगली जानवरों पंछियों की स्वाभाविक अठखेलियाँ देख कर हर्ष विभोर रह गए। उद्घोषक की आवाज़, उच्चारण एवं अन्दाज़ में चुम्बकीय आकर्षण था, बस ऐसा लगा कि यह आवाज़ हमेशा सुनते रहें। इस के बाद शो में कुछ जानवरों के करतब देखे जो अनूठा अनुभव था।
सिंगापुर मेनेजमेण्ट यूनीवर्सिटी में संगोष्ठी हुर्इ, जहाँ शिक्षा, प्रबन्धन, छात्रवृत्ति, प्रवेश आदि की उपयोगी जानकारी मिली। वहाँ हमने अपनी 5 – 6 पुस्तकें वरिष्ठ मैनेजर डरेन हेनसन को भेंट की तो वो गद्गद हो गए। लंच में थोड़ा सा वक़्त बचा कर हम ने वहीं मोल में से कुछ फल, चिप्स, चॉकलेट ड्रिंक्स आदि ख़रिदे। बहुत कुछ नए फल, मेवे, सब्जियाँ वहाँ देखीं। अब हम काफी ऊँचे रॉपवे से सेण्टोसा आइलैण्ड को देख रहे हैँ। एक आइलैण्ड से दूसरे आइलैण्ड का सफ़र बहुत अद्धभुत था। पूरा सिंगापुर, सागर, सेण्टोसा आइलैण्ड एक साथ देखा जा रहा था। नीचे बड़ेबड़े क्रूज वाले जहाज भी बड़ा मन मोह रहे थे। ऐसा अद्वितीय नजारा, जो पहले कभी देखा नहीं था। जिधर देखते बस प्रकृति का सौन्दर्य ही सौन्दर्य बिखरा पड़ा था। क्याक्या देखें, किसे कैमरे में कैद करें, कुछ समझ में नहीं रहा था। इस वक़्त अपना एक शैर सार्थक लगने लगा था
ख़ूबसूरत भी नज़ारे हैं बियाबानेजहाँ में
अपनी नज़रों को वही मंजर दिखाना चाहती हूँ
सेण्टोसा आइलैण्ड ज्योंज्यों करीब आता गया हरियाली से लदी धरती देख कर दंग रह गए। जब टॉयट्रेन से आइलैण्ड की सैर की तो लगा कि प्रकृति इतनी खूबसूरत भी हो सकती है, एकदम जन्नत का नज़ारा था सामने। ज़र्राज़र्रा सुषमा से लदा था। कभी कोर्इ कहता ......... अरे रे इधर देखो ....... कितना प्यारा दृश्य है ..... तो कभी दूसरा हमसफ़र कहता ........ इधर देखिए ..... वॉव ...... कितना प्यारा है यह सीन। इस आइलैण्ड के लिए तो 2 – 4 दिनों की यात्रा कम है। किसी शायर ने कश्मीर के लिए कहा था
अगर फ़िरदौस बररुज़मीनस्त
हमीनस्तौ, हमीनस्तौ, हमीनस्तौ
यानी ज़मीन पर कहीं जन्नत है तो यहीं है, यहीं है। सेण्टोसा आइलैण्ड के लिए हम यही कह सकते हैं।
बीचबीच में बीच आते गए, जहाँ कितने ही प्रकृतिप्रेमी जल क्रीड़ाऐं कर रहे थे। ये बीच किनारे भी बहुत हट कर थे, मन में आया कि यहीं उतर कर कुछ देर पानी से गुफ़्तगू कर लें। लेकिन ........? अब हम गए हैं मछलियों की दुनिया यानी अण्डर वाटर वर्ल्ड में जहाँ पानी में इठलाती मछलियाँ ही मछलियाँ सैंकड़ों प्रजातियों की बहुरंगी मछलियाँ। छोटी से छोटी मछली तो काफी विशाल मीन यहाँ देखी जा सकती है। पानी में इन की स्वाभाविक जल क्रीड़ाऐं देख कर दातों तले अँगुलियाँ दबाये बिना नहीं रह सके। वृत्ताकार में चल रास्ता बना हुआ था। चारों ओर से फ्लैशें चमकने लगीं। बहुत खूब सारा दृश्य देख कर एक दम यही चौपार्इ की पंक्ति याद गर्इ
गिरा अनयन, नयन बिनु बानी
गूँगें के गुड़ वाली स्थिति हो गर्इ थी। इस नज़ारे का हम दूसरी बार अवलोकन करने का लोभसँवरण नहीं कर पाए। बाहर कर कुछ देर सारा समूह मटरगश्ती करने लगा। राजस्थान पत्रिका के प्रबन्धक प्रवीण नाहटा साहब, भोपाल मीड़िया के आशीष जोशी जी, गुजरात के कृष्णकांत जी, राजस्थान के विजेता छात्र रामेश्वर जी, मध्य प्रदेश के छात्र अजीत कुमार, सिक्किम के अमित जी, कोलकाता की शाहीन जी से तो काफी आत्मीयता हो चुकी थी। हास्यविनोद, चुटकियाँ लेना, छेड़छाड़ करना,........ परस्पर चिढ़ाना ....... चलता रहता। अपनी बिटिया स्वप्निल की भी इन से खूब पटने लगी थी। परिवार जैसा माहौल हो गया था। जब भी नाहटा साहब से उन की कैप, जो उन्होंने पाँच डालर में खरीदी थी, माँगते तो कहते पाँच डालर लगेंगे...... जीवन में इन पलों को अनमोल कहा जा सकता हैं। समूह में सफर का आनन्द तो जुदा ही होता है ना ! चाहते हुए भी लौट कर आना पड़ा एवं भारत के राजदूत श्री रवि बाँगड़ साहब से मुलाकात हुर्इ। उन को भी हम ने अपनी एक पुस्तक भेंट की तो हर्षविभोर हो गए। हमारा पता पुस्तक पर देखा, अपना विजिटिंग कार्ड हमें दिया। अगर आप इसे आत्मश्लाघा मानें तो यह उक्ति याद आर्इ ...... विद्व जन सर्वत्र पूज्यते। वहाँ भी कर्इ फोटोग्राफ्स लिए गए।
अगले आधे दिन शहरभ्रमण हुआ एवं बाद में कुछ हमसफ़र जुरोंग बर्ड पार्क गए जहाँ 8,000 प्रजातियों के प्राणी हैं, पेंग्विन भी है तो विश्व का सबसे ऊँचा मानव निर्मित झरना भी। कुछ ग्लोसिटी तफ्रीह कर के आए। डिनर के बाद हम भी बर्फ पर फिसलने, खेलने में पीछे नहीं रहे। सब की रातें शॉपिंग माल में जागती रहतीं। हम लोगों का बस चलता तो सारा सिंगापुर ही खरीद लाते। क्याकुछ नहीं मिलता इस ज़रासे राष्ट्र में, हालाँकि ज्यादातर चीजें यहाँ आयातित ही होती हैं।
लौटते में तो सब की शरारतें और बढ़ने लगी थीं। करीब भी ज्यादा ही गए थे। पत्रकार बन्धु कब मानने वाले थे। प्लेन में भी स्नेप ले लिए, विडियोग्राफी भी कर डाली। केप्टिन से संवाद भी हुआ।
सारांशतः सिंगापुर अत्यल्प संसाधन होने के बावजूद अत्याधुनिक टेक्नोलोजी में अग्रणी है। क्या कुछ नहीं है वहाँ। के नागरिक भी काफी श्रमनिष्ठ, विनोदप्रिय, शिष्ट मिलनसार हैं। दुनिया में सब से कम अपराध होते हैं वहाँ। सब कुछ अनुशासित, स्वतःचलित, जहाँ देखो वहाँ एयर कण्डीशन, एक से एक भव्य शॉपिंग मॉल। साइन्स सेन्टर में स्कूली बच्चों से भी मिलने का अवसर मिला। सब के P.T. जूते थे, टार्इवार्इ किसी के नहीं बँधी थी। उन की पुस्तकें देखीं, इंग्लिश की थीं। वहाँ इंग्लिश ही माध्यम भाषा है। इस के अलावा मलय, चाइनी चलती है। वहाँ लड़कियाँ महिलाऐं सर्वत्र काम करती देखी जा सकती हैं। नागरिक बहुत स्मार्ट दिखार्इ दिए। जीप ठेला ही दिखार्इ दिया। स्वच्छता का यह आलम था कि टॉयलेट में खूशबू आती थी, वहीं नीचे फर्श पर ही सामान रख दिया करते थे हम। होटल में पीने का पानी तो बाथरुम में से ही पीना पड़ता है। सब जगह एकसा साफ़ पानी आता है। फिर कुछ इतना साफ़ कि रसोर्इ हो या टॉयलेट कोर्इ फर्क नहीं पड़ता। वहाँ सड़क पर छिड़कने या दुकानमकान धोने में पानी का दुरुपयोग कहीं देखने में नहीं आया।
बस इतना ही कि अलौकिक अद्भुत है सिंगापुर। दिलोंदिमाग पर छा गया है हमेशा के लिए। खुशकिस्मती से कुछ लम्हें जीवन को प्रमुदित करने आए एवं हमारी आगोश में कुछ अविस्मरणीय स्मृतियाँ छोड़ कर चले गए। अस्तु।
(कृष्णा कुमारी)