Thursday, 28 July 2016

भय बिन  होय प्रीत       निबंध
              भारतीय संस्कृति में अक्षर ब्रह्म  स्वरूप माने जाते हैं। इसलिये साहित्य कालजयी तथा चिरंजीवी होता है। लेकिन यह भी सत्य है कि समय के साथ - साथ कई कारणों से इसका स्वरूप परिवर्तित होता जाता है। कहते हैं कि एक बात चार्- पाँच व्यक्तियों तक पहॅुंचते पहॅुंचते पूरी तरह बदल जाती है। ज़ाहिर है कालान्तर में साहित्य का मूल स्वरूप बहुत कुछ परिवर्तित हो जाता होगा इस बदलाव के कई कारण हो सकते हैं , यथा - प्रकाशन में त्रृटि, शब्द के अनेकार्थ, समालोचकों द्वारा परिवर्तन, समयानुसार परिवर्तन ऐसी स्थिति में किसी भी रचना के अर्थ ग्रहण में संदेह होने पर रचनाकार द्वारा लिखित मूल प्रति ही उस संदेह का निराकरण कर सकती हैं। ऐसा नहीं होने पर लोक में अनेक भ्रांतियॉं जन्म ले सकती है , दोषी रचनाकार ही ठहरता है। कई बार तो एक शब्द के अनेकार्थ होने पर भी भ्रांतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
इस संदर्भ में महान् मनीषी,प्रकाण्ड विद्वान गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित सर्वाधिक लोकप्रिय. लोकप्रचलित महान् महाकाव्य रामचरितमानसको लेकर कई संदेह जनमानस में उत्पन्न हो रहे हैं .एकाध उदाहरण से अपनी बात की पुष्टि संभव है।
ढोल,गँवार, शूद्र, पशु नारी.
सकल ताड़ना के अधिकारी
प्रस्तुत चौपाई सर्वाधिक विवाद का विषय बन चुकी है। बड़ी बड़ी सभाओं में विद्वत- जन इसके विपक्ष में अपने मन्तव्य प्रस्तुत करते हैं एवं तुलसीदास जी को नारी शक्ति का विरोधी घोषित करने में कोई क़सर नहीं छोडते। इसी प्रकार सुन्दरकाण्डमें सागर - संतरण के प्रसंग में श्रीराम रत्नाकर से लंका गमन हेतु रास्ता देने के लिये तीन दिन तक अनुनय - विनय करते हैं। मगर इसका उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। स्थिति यथावत बनी रहती है। तब श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-
विनय मानत जलधि जड़ , गये तीन दिन  बीति
बोले राम सकोप तब , भय बिन होय प्रीति
       अब हम उपरोक्त चौपाई  एवं दोहे ही के संदर्भ में निष्पक्षता से विवेचना करें तो संदेह होना स्वाभाविक है। जहाँ तक भय से प्रीत की उत्पत्ति का सवाल है. बात पूरी तरह गले नहीं उतरती इस धृष्टता के लिये क्षमा चाहते हुये इतना ज़रूर है कि कहीं कहीं कोई चूक ज़रूर हो रही है। तुलसीदास जी की प्रस्तुत पंक्ति को श्रीराम के मुखारबिंद से कहलवाने की पृष्ठभूमि में क्या भाव रहा होगा यह पूर्णतः ज्ञात नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है कि भयसे प्रीत की निष्पत्ति होने मे संशय की गुंजाइश अवश्य है हमारी अल्प बुद्धि को यह बात क़तई स्वीकार नही हो रही।
भला यह बात कैसे गले उतरे कि भय से प्रेम की निष्पति हो सकती है। साहित्य की दृष्टि से भी दोनों विपरीत भाव हैं। एक सकारात्मक़ दूसरा नकारात्मक मानव मन के दृष्टिकोण से भी यह अनुचित ठहरता है। भय से दुनिया के वे सारे कार्य करवाये जा सकते हैं .जो सम्भवतः प्रेम से असंभव हों। साम ,,दाम,  दण्र्ड, भेद से भी शायद करवायें जा सकें। बेशक़ भय बहुत बुरी बला है. इतनी बुरी कि इसके मारे भूत भी भागते हैं,  फिर आदमी की क्या मजाल कि डर के मारे भागे भय तो वह ख़तरनाक भाव है जिसके मारे बर्डे- बडे सूरमाओं तक की कँपकंपी छूटने लगती है। डर के कारण आदमी की बुद्धि तक जड़ हो जाती है। वह कुछ करने की स्थिति में नहीं रहता। ऐसी भयंकर शय से भगवान बचाये। स्थिति स्पष्ट है कि भय से प्रेम का आविर्भाव कैसे संभव है |
         प्रेम तो वह सात्विक , दिव्य भावधारा है जो निर्मल हृदय से स्वतः प्रवाहित होती है। प्रेम वह जज़्बा है जो अनायास आविर्भूत होता है, कि सोच समझ कर किया जाता है। कब, कहॉं, किससे, कैसे, क्यों हो जाता है प्यार ,यह तो ख़ुद प्रेमी मन भी नहीं जान पाता किसी के भी जीवन में यह क्षण कभी भी सकता है और उसके अन्तः स्थल से प्रेम के अनंत प्रकाश पुंज प्रस्फुटित हो सकते हैं और उसका पोर - पोर आलोकित हो उठता है| ऐसा चमत्कारी, अदभुत, क्रांतिकारी भाव है प्रेम| जाहिर  है कि जो प्रेम सोच - समझ कर, जान -बूझ कर नहीं किया जा सकता है।फिर भला, डरा धमका कर कैसे उत्पन्न किया जा सकता है|
           महाकवि तुलसीदास जी की इस पंक्ति पर बार-बार विश्वास करने को जी चाहता है मगर अगले ही पल मन नहीं मानता। किसी भी बात को  भय दिखा कर अमुक इंसान से बडे से बड़ा काम करवाना मुम्किन है। मगर प्रेम …… प्रेम ही क्या प्रेम का नाटक भी एक बार तो मुश्किल हो सकता है। फिर भी एक दिखावा, छलावा, आडंबर किया जा सकता है। कितनी ही बार किन्ही विवशताओं के वशीभूत होकर आदमी को यह सब तमाम उम्र भी करना पड़ सकता है। हाँ. कभी कभी एक लम्बे अरसे तक बरबस साथ रहने वाले व्यक्तियों मे अनायास,. सहानुभूति, लगाव आदि पैदा हो जाता है लेकिन उसे प्रेम की संज्ञा नहीं दी जा सकती। कुछ मुआमलों में संगति से स्वतः प्रेम हो भी सकता है मगर यहाँ भय की कोई बात नहीं होती। ऐसे में डर से प्रेम की उत्पत्ति पर प्रश्र्नचिन्ह संभव है। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि किसी के दिल में किसी के प्रति थोड़ा बहुत प्रेम हो और  उसे किसी बात पर बार बार धमकाया जाये तो प्रेम समाप्त भी हो सकता है। और यदि समाप्त भी हो तो, कम से कम अप्रकट तो रहेगा ही रहेगा।
           रामचरितमानस के प्रसंग में ही इस उक्ति की विवेचना करके देखने से भी यही जाहिर होता है कि श्रीराम के अग्निबाण साधने पर सागरभयभीत होकर ही ब्राह्यण का रूप धारण करके भगवान के समक्ष प्रकट होता है। इसके पूर्व तीन दिन तक जगत् नियन्ता श्रीराम समुद्र से करबद्ध होकर श्रीलंका तक मार्ग देने के लिये विनय करते हैं | लेकिन श्रीराम की अनुनय- विनय का उस पर कोई असर नहीं होता। लेकिन अग्निबाण चढ़ाते ही वह श्रीराम के सामने प्रकट होता है। स्पष्ट है कि वह डर के कारण आता है कि प्रेम के वशीभूत होकर। उसे डर लगता है स्वयं के सूख जाने का. इस से भी ज़ियादा उसके भीतर पलने वाले करोड़ों जीव - जन्तुओं के विनाश का. जिनके पाप का भागीदार वह बनता।
प्रस्तुत चौपाई में जडशब्द का प्रयोग भी उल्लेखनीय है जलधि’ ‘जड़है चेतननहीं इसलिये उस पर प्रेम का. विनय का प्रभाव असम्भव है, यह बात गले उतरती है , क्योंकि जड़ होने के कारण विनय का असर नहीं होता है तो भय का प्रभाव भी असम्भव है। साथ ही प्रेम या अन्य कोई भी भाव चेतनशील जीव ही अनुभूत कर सकते हैं |जड- जगत् का इससे कोई वास्ता नहीं है। इसी के साथ अगर हम सागर का लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करके उसे जल -देवताके रूप में स्वीकार करें तब भी बात स्पष्ट नहीं होती। देवगण भगवान् के आदेश की अवहेलना करने  का भी दुस्साहस नहीं करते तो विनय अस्वीकार करने का तो सवाल ही नहीं उठता।
इस प्रसंग में मैंने राजस्थान पत्रिका के स्तम्भ ‘ LIFE MANTRA “ में डॉ विजय अग्रवाल का ‘ ‘प्रीतका डर से सम्बन्धशीर्षक लेख पढ़ा तो चकित रह गई और आश्वस्त भी हुई कि मैंने महाकवि तुलसीदास की इस उक्ति के विपरीत लिखने का जो दुस्साहस किया है वो सही है ......इस से मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ा.....पढिये उन्हीं की जुबानी .......
‘ ......श्री राम के साथ भी वही हुआ ,लंका पहुँचना है | रावण से युद्ध करने के लिए| राम और रावण के बीच लगभग साढ़े बारह सौ किलोमीटर का समुद्र फैला हुआ है | श्री राम ने समुद्र से प्रार्थना की कि रास्ता दे दो|और समुद्र भूल गया कि श्री राम ने उस से कुछ कहा है .................कहाँ श्री राम के लिए एकएक पल कीमती था ........बस गया श्री राम को गुस्सा ..........और अपने धनुष पर अग्निबाण चढ़ाया उन्होंने कि अब मैं इस समुद्र को सुखा ही डालता हूँ |यह देखते ही समुद्र डर गया और हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगते हुए राम की बात मन ली |....यहाँ रामचरितमानस में एक सिद्धान्त वाक्य आया हैभय बिनु होय प्रीतसमुद्र चुपचाप पड़ा था |श्री राम ने भय दिखाया तब वह लाइन पर आया |
...........मेरा निवेदन यहाँ ये है कि जब हम ऐसे वाक्यों को उस के पूरे सन्दर्भ से काटकर इकलौती पंक्ति के रूप में देखते हैं तो उस वाक्य के अर्थ के साथ कभी न्याय नहीं कर पाते |दरअस्ल यहाँप्रीतका भावार्थ प्रेम से होकर आज्ञापालन से है |यहाँ जीवन में उपजने वाले प्रेम की बात नहीं हो रही है |...उस प्रेम की बात हो रही है जिसकी जरुरत प्रशासन में होती है एडमिनिस्ट्रेशन में होती है | इस में कोई दो राय नहीं कि वहां थोडा डर दिखाना ही पड़ता है |साथ ही इस में भी कोई दो राय नहीं रखनी चाहिए कि जहाँ भय होगा ,वहां सच्ची प्रीत कभी नहीं हो सकती | वाल्मीकि ने इस स्थान परआदरशब्द का प्रयोग किया है |
समग्रतः. भय से प्रीत का अविर्भाव संभव है. हमारी समझ के तो बाहर है। हाँ, तुलसीदास जी ने लक्षणा द्वारा कुछ अन्य ही तात्पर्य में प्रस्तुत उक्ति को प्रयुक्त किया हो सो अलग बात है। संभव है प्रतीकात्मक भाव रहा हो।
इसी प्रकार ढौल, गँवार , शुद्र, पशु, नारी चौपाईपर भी निरंतर विवाद बना हुआ है। कोई विद्वान ताड़ना को तारनामान कर सभी को स्वतः तारनेयानी संसार सागर - से तरजाना,  मोक्ष प्राप्ति हो जाना मानते हैं । उनका मानना है कि ताडना की जगह  तारना’ शब्द रहा होगा। कालांतर में प्रकाशन में त्रुटि सम्भव है ।अधिकतर आलोचक तुलसीदास जी को नारी विरोधी सिद्ध कह चुके है। इस चौपाई में अर्थ भंग क्यों हो रहा है, समझ में नहीं आता। हमारे एक मित्र को उनके पिताश्री ने इस चौपाई की व्याख्या करते हुये बताया था कि नारी चड़सको खींचने वाली रस्सी को कहते हैं । जब चड़स कुए के ऊपर तक जाता है तब उसका पानी बाहर निकालने के लिये उस रस्सी को चड़स चलाने वाले व्यक्ति द्वारा जोर से झटका देना पड़ता है। यानी नारीको झटकना पडता है। सम्भव है उपरोक्त चौपाई में नारीशब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुई हो।
तुलसीदास जी नारी विरोधी हो सकते हैं, यह बात भी मन स्वीकार नहीं करता क्योंकि उन्होंने मानस में सभी नारी पात्रों का पूरे सम्मान एवं प्रतिष्ठा के साथ चित्रण किया है। शबरी भीलनी को श्रीराम के द्वारा इतना प्रेम एवं प्रदान करवाने वाले रचनाकार नारी विरोधी नहीं हो सकते।
अतः ऐसे प्रसंगों पर टिप्पणी करने से पूर्व समालोचकों को मूल  ग्रंथ का अवलोकन ज़रूर करना चाहिये। क्योंकि साहित्य के क्षेत्र में ज़रा भी लापरवाही अर्थ का अनर्थ कर सकती हैं जो गम्भीर बात है। यदि कहीं गलत हो रहा है तो सच बात पाठकों के सामने लाना समालोचकों या रचनाकारों का उत्तरदायित्व है ताकि लेखक एवं पाठकों के साथ न्याय हो सके।
रामचरितमानस तुलनात्मक अध्ययननामक पुस्तक पढने का हमे सुअवसर मिला है। इस में अध्यात्म रामायण, पदमचरित , कदम्बरामायण, वाल्मिकि रामायण सहित देश के विभिन्न राज्यों की भाषा में लिखी गई रामायणो का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया। इस अध्ययन में रामकथा की घटनाओं चरित्त्र - चित्रण आदि में इतना विरोधाभास मिला कि हैरान रह गये
|असमंजस
की स्थिति उत्पन्न हो गई। कहने का तात्पर्य यही है कि सभी क्षेत्र रचनाकारों, टीकाकारों एवं समीक्षकों के द्वारा पौराणिक आख्यानों में बहुत परिवर्तन हो जाता है।
इसी संदर्भ में एक और विचारणीय बिन्दु है कि भयसे प्रीत उत्पन्न नहीं होती लेकिन प्रीत होने पर भय जरूर उत्पन्न हो जाता है। क्योंकि जो हमारा होता है. हमें प्रिय होता है उसे हम हमेशा अपने पास रखना चाहते हैं।इसलिये उसके खोने का. अलग हो जाने का भय हर  पल हमें सताता रहता है। संयोग के साथ वियोग संसार का शाश्वत सत्य है। यही सत्य भय की उत्पत्ति का कारण बनता है। साथ ही भय की मात्रा प्रियता की सघनता से जुड़ी होती है। जो वस्तु जितनी प्यारी होगी उसके विलग होने का डर उतना ही अधिक होगा। जाहिर है कि आलम्बन या प्रियतम तो हमे जान से भी अधिक प्रिय होता है. फिर भला प्रेम से अधिक प्यारा तो कुछ हो भी नहीं सकता। अतः प्रीत से भय की निष्पत्ति स्वाभाविक है।
समग्रत , भय से प्रीत का अविर्भाव होता है या प्रीत से भय का जन्म होता है हर प्रसंग की भॉति इस प्रसंग में भी सबका अपना-अपना द्वष्टिकोण , मत , चिंतन - मनन का होना सहज बात है।फिर भी यह बिन्दु गहन विचारणीय है। अस्तु।
कृष्णा कुमारी


चिंतन                              प्रकृति –चिंतन


बारह मासों में सब से खूबसूरत ,पवित्र महीना .....सावन ....|जिधर देखिये हरियाली का साम्राज्य  ........हरित वसुंधरा ....  शीतल मंद पुरवाई  ...झूलों का आनंद ..... बरखा बहार .... पर्वों की भरमार ......गर्जन , नर्तन, गोठों, मेलों  व पिकनिक का आयोजन ..,.....कल –कल ..छल-छल.......रिमझिम .. रिमझिम ...झर-झर झरते झरने  ,.बारहमासो के  गीतों का गायन.....;kuh सब कुछ परवान पर....आस्था के तो कहने ही क्या ....हर दिन भजन कीर्तन....अभिषेक ....व्रत ...उपवास.... आरती .... Ük`aगार .......पुण्य कमाने के लिए सर्वोÙkम महीना …सावन...| मगर इसी के साथ पर्यावरण का  ........? ........                               
परjUrq क्या कीजे ...आस्था से बड़ा तो ....? प्रति दिन हजारों की मात्रा में बील–पत्र भगवान शिव –शंकर को चढ़ाये जाते हैं ....असंख्य फूल ......आंकड़े के पÙks ...धतूरा.... जलाभिषेक  ......दूध - स्नान ......भगवान जी को खुश करने के लिए .... इस के कुछ दिनों बाद जन्माष्टमी , फिर एकादशी ;kuh साल भर कोई न कोई उत्सव हमारे यहाँ मनायk जातk हैं | शादी-समारोह हो या स्वागत-सत्कार या और कोई भी उत्त्सव ...सब में फूल –पÙkksa का यहाँ तक कि डालियों तक का  बहुतायत से उपयोग किया जाता है ..मगर इस उत्सवधर्मिता के शोर में प्रकृति –पीM+k की कराह दब कर रह जाती है | ....जबकि इस का संरक्षण भी तो पुण्य की ही श्रेणी में आता है  |एक तरफ बूंद –बूंद बचाओ ...का धुआंधार प्रचार ...और इधर जलाभिषेक,दूध स्नान दूसरी ओर......दूध को तरसते गरीबों के मासूम बालक ...और......?पर्यावरण बचाओ के लिए विश्व –स्तर पर ..अनेकानक प्रयास ..किये जाते रहे हैं |मगर ..पूजा भी तो जरुरी है .बिलकुल जरुरी है.....इसी से दुनिया में शांति कायम है|ये न हो तो आदमी .....आदमी न रहे......| ...क्योकि ईश्वर.प्रेम और भय से आदमी कई पाप कर्मों को करने से डरता है , मगर हमें मिल कर , जरा सा ठहर कर गहन चिंतन –मनन करना चाहिए  .....
                         .हम सदियों से चली आ रही पूजन की पद्धतियों का अनुसरण कर रहे हैं |तब की बात और थी |उस समय पर्यावरण इतना प्रदूषित नहीं था ,आबादी अत्यल्प थी, सघन वन हुआ करते थे |प्राकृतिक वैभव  चरम  पर था|लेकिन  आज की स्थिति एक दम भिन्न  है| आज एक –एक पत्ती व फूल को बचाना जरुरी है| पानी की एक-एक  बूंद अनमोल है |और फिर  अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी शिव -शंकर जी तो बड़े भोले हैं |वो तो भाव से ही गदगद हो जाते हैं |शायद वो भी चाहेंगे की उन की रचना को हानि  नहीं पहुंचाई जाये |वो चाहेंगे कि  उन के  चढ़ावे का  दूध जरा सा उन पर च<+k कर शेष किसी गरीब के बालक को पिला दिया जाये |
                      आज का युग तो  वैसे ही हाईटेक का है, …..तो पूजा क्यों नहीं....? हम ऐसा कोई तरीका मिल कर निकाल सकते हैं जिस से आस्था भी बनी रहे और प्रकृति का  नुकसान भी न हो, जैसे इको –फ्रेंडली होना .... उदाहरण के लिए फूल –पत्तियों की जगह फलों को काम ले सकते हैं |ताकि पूजन के बाद उन  का सदुपयोग भी संभव है |और यदि ये भी नहीं तो कम से कम  जितने फूल – पत्ते  तोड़े जाएँ उस से दुगुने उसी के पेड़ –पौधे लगा दिए जाएँ  याuh जितना लें उस ls जियादा सृजन कर लें |कहा भी जाता है कि किसी चीज का संरक्षण करना भी सृजन के बराबर ही है |  ऐसे और भी कई विकल्प हो सकते हैं , बस इतनी सी ही बात है | संतुलन में कोई कमी नहीं आये |ये भी कहा जाता रहा है कि  फूल डाली पर ही सुन्दर लगते हैं…… और फिर सावन तो प्रकृति का उत्सव है , इस की गोद मैं बैठ कर आनंदित होने का पर्व है ,पेड़ –पौधे लगाने का पुण्य महीना है ,क्योंकि ......पेड़ हमारे जीवन दाता,ये ही हमारे भाग्यविधाता ....|
                               हमारे सभी धार्मिक ग्रंथों में प्रकृति संरक्षण का उल्लेख है| वैदिक काल में एक फूल तोड़ने के लिए भी आज्ञा जी जाती थी |  कुरआन में भी लिखा है ...’सारी पत्तियां ,पेड़ ,पौधे ,दिल को राहत व सुकून पंहुचाते हैं और इंसानी अEनो –अमां के लिए जरुरी है |यह कुदरत का इंसान पर बहुत बड़ा अहसान है, हमें खुदा का शुक्रिया अदा करना चाहिए|’ –कुरआन , तीसवां पारा,-15 
                   विज्ञान और अध्यात्म के अनुसार दुनिया की हर वनस्पति औषधि है, इस से प्राणी जगत को अनंत उर्जा मिलती है |श्री कृष्ण तो स्वयं पर्यावरण  के उपासक रहे हैं |गोवर्द्धन धारण इसी की पुष्टि करता है |गीता में वो स्वयं कहते हैं कि... पीपल  में मेरा निवास है |इसी संदर्भ में  एक और बात  याद आ गई कि हमारे देश में कितने ही अवसरों पर रात  भर जागरण किये जाते है, ईश्वर की आराधना में वो भी अत्यंत तेज ध्वनि के साथ|  बिलकुल जागरण किये  जाने चाहिए| मगर धीमी आवाज में भी तो संभव है |कहाor है कि भोजन और भजन एकांत में ही करना चाहिए| तनिक विचार कीजिये यदि पM+kSस में कोई बीमार है ...और वो तेज आवाज के कारण नींद नहीं ले पाए तो.......किसी बच्चे की परीक्षा अगली सुबह हो तो ........किसी के सर में दर्द हो तो ..... या कोई अन्य मजबूरी ....और फिर ईश्वर तो सर्वOयापी है .....वो तो धीमे सुर को भी सुन लेंगे |इसी Hkkaति पूजन lkमग्री या केमिकल युक्त मूर्तियों का जल में विसर्जन  ....इस से जल तो प्रदूषित होता ही है साथ मैं जलीय जीवों की हिंसा भी |
सावन तो एक माध्यम भर है अपनी बात कहने का  , ऐसे कई- कई प्रसंग gSa जिन में प्रकृति का दोहन किया जाता है | करने वाले तो अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर फूलों की तिजारत  भी करते हैं ...यहाँ गजलकार पुरुषोत्तम ‘यकीनdk fuEu शैर बहुत प्रासंगिक gSa ...
ÞQwy ftl us [+kjhns&csps gSa
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                 कुछ दिनों पूर्व समाचार –पात्र  में पढ़ा था – एक प्रकृति - प्रेमी ने मंदिरों में चदाये गए फूल – पत्तियों से अगरबत्ती का  बनाने का उद्योग प्रारंभ लिया  दिया ,| इस से कई लोगों को रोजगार भी लिमा और प्रकृति के उपादानों का सदुपयोग भी | वाह.... क्या कहने  ..ये हुई ना बात

                                   मैं सिर्फ इतना ही विनम्र अनुरोध करना चाहती हूँ कि हमें ऐसी कई बातों पर मिल कर पुनर्विचार करना चाहिये ..ताकि आस्था भी बची रहे ....और प्रकृति भी ...|संभव है मेरा ये चिंतन –मनन आप को मन -भावन  नहीं लगे  | मगर ये केवल मेरा अपना नजरिया है |गलत भी हो सकता है ....मुझे क्षमा कर दीजियेगा, क्या करूँ मन की बात बिना कहे नहीं रह सकी क्यों कि मुझे प्रकृति से असीम प्रेम है  और आप को मुझ से भी जियादा है इसी लिए उदारता पूर्वक विचार ज़रूर कीजयेगा ,प्लीज |
                     हाँ ,मैं स्वयं  इन बातों का अनुसरण करती हूँ ...जन्माष्टमी  पर .झांकी फुलवारी में  ही बना लेती हूँ |एक दम जीवंत .....|वैसे भी समय के अनुसार बहुत कुछ परिवर्तन जरुरी हो जाता है |परिवर्तन ही तो सोंदर्य है ...|और क्या कहूँ, आप सब मुझ से vf/kd  समझदार gSa ....|बस  हमारी अर्जी , आप की मर्जी |
     “kkbj ^;d+hu* us vius ,d “kSj esa dgk gS  -----------
                     fn;k अपनी अदा जाने
              हवा क्या है, हवा जाने


कृष्णा कुमारी

                                                                                     
                 ‘शिखरों के हक़दार कृति : गागर में सागर

                       ‘शिखरों के हक़दार पढ़ने का  सुअवसर  मिला , एक अरसे बाद दोहा विधा की इतनी खूबसूरत कृति पढ़ी ,वाकई ये दोहे शिखरों के हक़दार  हैं | एक - एक दोहा ‘गागर में सागर’ | यह पुस्तक बरबस ही रहीम , बिहारी की याद दिला रही है |
       श्री रामनारायण जी ‘हलधर’ के कई –कई दोहे लोक की जुबान पर चढ़ चुके हैं , जो एक कृतिकार की लोकप्रियता और साधना को चिन्हित करते हैं |इसी के साथ - साथ विषयगत वैविध्य देखते ही बनता है | नूतनता और पारम्परिकता का अभूतपूर्व सम्मिश्रण यहाँ देखा जा सकता है | इस पुस्तक की सब से बड़ी विशेषता है , हलधर जी की मौलिक सोच, अंदाज़े – बयां , प्रतीकों की सुषमा , गीतात्मकता ... मिठास , लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति ...सरलता , माधुर्य , सौन्दर्य ....आदि आदि |
             हलधर जी ने जहाँ मौसम ,श्रृंगार , नारी मन , दाम्पत्य , प्रकृति - चित्रण , स्मृतियाँ ,रूप लावण्य को बहुत ही सूक्षमता के साथ  अभिव्यक्त किया है |वहीँ आम आदमी की पीड़ा , संत्रास , अभाव, अश्रु , ग्रामीण जीवन , टूटते  , रिश्तों की टीस और मानवीय संवेदानाओं को बखूबी  छूकर  एक नया मुहावरा प्रस्तुत किया है |वर्तमान परिवेश , मानवीय संबंधों की धड़कन इन दोहों में जीवंत हो उठी है | रामानारायण जी गहन चिंतन – मनन के सागर में डूबकर एक –एक मोती चुनकर लाये हैं |हर दोहा बेजोड़ है |इन के एक –एक दोहे पर बड़े –बड़े निबन्ध  लिखे जा सकते हैं और कृति पर शोधकार्य हो सकते हैं |
    अलंकर , बिम्ब ,गीति तत्व , शब्द सौन्दर्य ,शब्द शक्ति , व्यंजना , ध्वनि , अर्थात कला पक्ष को सुघड़ता और सौन्दर्य कृति में चार चाँद लगा रहे हैं |  बहुत ही कशमकश में हूँ कि किस दोहे को संदर्भित करूँ किसे नहीं |.....इतने अच्छे दोहे कोई कैसे लिख सकता है भला |....ये ही सोचकर अचम्भित हूँ  | इतना  मौलिक चिंतन – प्रस्तुतीकरण ,  बात कहने का नायाब सलीका  रामनारायण जी का ही हो सकता है जो काबिले – तारीफ है |. बतौर बानगी देखिये ...
‘ तुम कहते हो प्रेम की , यादें बड़ी ख़राब
क्यों रक्खे हैं आज तक , सूखे हुए गुलाब
अहसानों  का सिलसिला इतना ना बढ़ जाये
तेरी नीयत पर मुझे , शक होने लग जाये
कहाँ छुपाऊँ आप को , कहाँ जताऊँ प्यार
इतना छोटा शहर है , इतने रिश्तेदार
मौसम की शैतानियाँ , छू न सके दहलीज
            हर पौधे को बांधता , रहता हूँ ताबीज
लिखूं स्वयं के नाम के , साथ आप का नाम
लगता है पापा खड़े , मेरी उंगली थाम
और दिशाएं प्रीत की , मनवा बैठा भूल
तुम सूरज तो हम हुए , सूर्यमुखी के फूल
        हर दोहा अपने आप में नाविक का तीर है | हलधर जी के लोक  भी बहुत प्रचलित हैं ,ख्याति  अर्जित कर रहे हैं  | बड़े –बड़े विद्वानों ने इन दोहों की भूरि - भूरि सराहना की हैं |श्रोता इन को सुनकर मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं |पाठक  निहाल हो जाते हैं |सच कहूँ तो इन के दोहों में चमत्कारिक असर है | हलधर जी को दोहों का शहजादा  कहा जा सकता है | यह अत्युक्ति नहीं अपितु यथार्थ  है | इन के उत्तरोत्तर उन्मेष के लिए अनंत शुभकामनाएं ..., साधुवाद | दोहों के गगन में ध्रुव की भाति दैदीप्यमान रहें .... इन्ही शुभाशंषाओं के साथ


....                                        कृष्णा कुमारी

  

Sunday, 10 July 2016

ग़ज़ल
आसमॉ पर मेघ काले जब से गहराने लगे
भूले - बिसरे – से फ़साने मुझको याद आने लगे
देखते ही मुझ को उठ कर बज़्म से जाने लगे
जाने क्यूँ मुझ से वो अब इस दर्जा कतराने लगे
मैंने पूछा, कैसे ख़ुश रहते हैं आप इस दौर में
कुछ न बोले, मुझ को देखा और मुस्काने लगे
तुम से मिलने की मेरी बेचैनियों ने ये किया
रो पड़े अहसास और जज़्बात घबराने लगे
तुम को देखा, ख़ुश्क ऑखें अश्क़ बरसाने लगीं
रेत के  सागर में गोया खेत लहराने लगे
इक नदी – सी भर गई है मेरे घर के सामने
कागज़ी नावें बना कर बच्चे तैराने लगे
रात को यूँ देर से घर लौटना अच्छा नहीं
सहमे – सहमे रास्ते मुझ को ये समझाने लगे                   
जो कि मिस्ले – तिफ़्ल थे कल तक वही कमसिन हमें                                               अब जहाँदारी ज़माने भर की सिखलाने लगे
v   

                   

·         कृष्णा कुमारी

                                     





Thursday, 19 November 2015


तुम्हें न आई याद हमारी            

                        

तिल-तिल उम्र गवाई सारी

तुम्हें न आई याद हमारी

सावन गरजा, भादो बरसा

होली में तन –मन भी तरसा

दीपाली पर स्नेह लुटाया

फिर भी मन मेरा ही तरसा

बाती बनाकर रात बिताई .......तुम्हें न .....

बस्ती  के हर चोराहे पर

तुम को कितनी बार पुकारा

हाथ थाम कर पथ पर चलना

क्या तुम को है नहीं गवारा

मैं तो इस जीवन से हारी ...तुम्हें न .....

मेरी अश्रु झड़ी के आगे

सावन भी तो हार गया

करुण-कणों का दान मांगने

वह सागर के द्वार गया

मन की धार लुटाई सारी...तुम्हें न ....

लिए हाथ में विष का प्याला

पिया श्याम की मीरा बनकर

खड़ी हुई जन्मों से प्यासी

स्मृति की गागर ले पनघट पर

चिर वियोगिनी बनी तुम्हारी

तुम्हें न आई याद हमारी