Saturday, 4 July 2015


पानी के दोहे




जल जीवन ,जल प्राण हे ,जल जगती का जान

जीना हे तो कीजिये ,जल धन का सम्मान

जल गीता ,जल बाईबल ,जल जैसे कुरआन

जल ईसा ,जल कृष्ण हे ,जल अल्ला भगवान

जल की हमने की नहीं ,अगर हिफ़ाजत आज

कल केसे सुन पाएंगे ,कल कल की आवाज

रोटी लटकी चाँद पर ,जल पहुंचा आकाश

त्राहि -त्राहि भू पर मची ,रे मानव शाबाश

व्यर्थ बहा मत ऐश में ,व्यर्थ कर छिडकाव

सोने से बढकर समझ ,नादाँ जल का भाव

दस दस उपग्रह भेज कर ,गर्वित हे सरकार

मीलों तक पहुंची इधर ,जल के लिए कतार

 

 

दीप नयनों के जलाए .......

रात भर पथ में तुम्हारे

दीप नयनों के जलाये

तुम को आना था , आये

नम है आँचल कि किनोरें

अश्रु बरसती है मेहंदी\

रह गए कंगन सुबकते

गीत पायल गाये

तुम को आना था ……

हर दिशा की दृष्टि आतुर है

तुम्हारे ही परस को

सौम्य दर्शन को विह्वल -सी है

सजल शीतल हवा ये

तुम को आना था .......

वेदना सह कर विरह की

पड़ गया है , व्योम काला

याद के अस्पुत सितारे

रह -रह झिलमिलाये

तुम को आना था .......

चाँद भी सोने चला अब

भोर कि रक्तिम गुहा में

आस की मद्दम - सी लौ पर

ओस सी पड़ती ही जाये

तुम को आना था


 

Sunday, 5 April 2015


बसंत




कोयल से कहा मैंने सखि !

मेरी बोली को दे -दे थोड़ी सी मिठास

वह झट से मान गई

फूलों ने मुझे दे दी खुश -खुश खुशबू की बहार

कलियों ने फिर भर -भर अँजुरी

मुझ पर दी उड़ेल अपनी

हँस कर अपनी उन्मुक्त हंसी

भौरों से सीख लिए मैंने सब प्यार के गीत

भीनी -भीनी गुन -गुन

पायल में हवाओं में

भर दी रुन -झुन ,रुन झुन

और झरनों का संगीत

इठलाना बक्श दिया

तितली ने स्वयं मुझ को\

और झील के पानी की उद्दाम तरंगों ने

दी अपनी चंचलता

रक्ताभ पलाशों ने रंग डाले कपोल मेरे

मेहंदी ने हथेली पर रख दी अपनी सुर्खी

इक वृद्ध अशोक ने फिर वरदान दिया मुझ को

जीने का शोक रहित

और मुझ में उतर आया मानों कि समूचा वसंत

जो रोप गया खुशियाँ

मेरे अंतस में अनंत