Sunday, 5 April 2015


 
 

ग़ज़ल

 

नहीं किया जो अभी तक ,वो कर के देखते हैं

हरेक शय को हदों से, गुजर के देखते हैं

अकेले हैं तो चलो सज सँवर के देखते हैं

हम अपने आप को ही , आँख भर के देखते हैं

बहुत हँसीन है, देखा है , चाँद धरती से

लो आज उस की जमीं पर उतर के देखते हैं

भुला रखा है हमें जिस ने , इक ज़माने से

करेगा याद , उसे याद करके देखते हैं

कभी झुके , कभी उठ्ठे , खिले , मिले पिय से

कमाल ऐसे भी उन की , नजर के देखते हैं

जिधर भी देखो उधर , खौफनाक मंजर हैं

हरेक शख्स को हम, अब तो डर के देखते हैं

पलक झपकते ही , छूले जमीं का हर कोना

लगें हो पंख ही, जेसे खबर के देखते हैं

कृष्णा कुमारी 'कमसिन '

 

पानी के दोहे




जल जीवन ,जल प्राण हे ,जल जगती का जान

जीना हे तो कीजिये ,जल धन का सम्मान

जल गीता ,जल बाईबल ,जल जैसे कुरआन

जल ईसा ,जल कृष्ण हे ,जल अल्ला भगवान

जल की हमने की नहीं ,अगर हिफ़ाजत आज

कल केसे सुन पाएंगे ,कल कल की आवाज

रोटी लटकी चाँद पर ,जल पहुंचा आकाश

त्राहि -त्राहि भू पर मची ,रे मानव शाबाश

व्यर्थ बहा मत ऐश में ,व्यर्थ कर छिडकाव

सोने से बढकर समझ ,नादाँ जल का भाव

दस दस उपग्रह भेज कर ,गर्वित हे सरकार

मीलों तक पहुंची इधर ,जल के लिए कतार

कृष्णा कुमारी

5

 

Wednesday, 1 October 2014

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दीप नयनों के जलाए .......

रात भर पथ में तुम्हारे

दीप नयनों के जलाये

तुम को आना था , आये

नम है आँचल कि किनोरें

अश्रु बरसती है मेहंदी\

रह गए कंगन सुबकते

गीत पायल गाये

तुम को आना था ……

हर दिशा की दृष्टि आतुर है

तुम्हारे ही परस को

सौम्य दर्शन को विह्वल -सी है

सजल शीतल हवा ये

तुम को आना था .......

वेदना सह कर विरह की

पड़ गया है , व्योम काला

याद के अस्पुट सितारे

रह -रह झिलमिलाये

तुम को आना था .......

चाँद भी सोने चला अब

भोर कि रक्तिम गुहा में

आस की मद्दम - सी लौ पर

ओस सी पड़ती ही जाये

तुम को आना था

कृष्णा कुमारी